Monday, 29 August 2016

बदलते चेहरे होसलेवाला

बदलते चेहरे
होसलेवाला
बकरीद:अपनों की बलि चढ़ाई जाए ताकि...
होसलेवाला 
Silver: 44
     
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बकरीद के मौके पर मोमिन अपने बकरे को दूल्हे की तरह सजाकर बाजार में घूम रहे थे संयोग से जो आदमी बकरा लेकर घूम रहा था वो अक्सर हमारी दूकान के आगे से गुजरा करता था मैं उस बकरे को देखकर बड़ा खुश हुआ चलो कम से कम इस बेजुबान जीव की तो जान बख्सी गई ये कोई शाम का वक्त रहा होगा मैंने जिज्ञासा वश बकरे वाले भाई को अपने पास बुलाया और दुआ सलाम की मैंने उस भाई से पूछा आज तो बकरीद है फिर ये बकरा कैसे सजा सवांर कर कहाँ घुमाते फिर रहे हो लगता है इस बकरे ने कोई अच्छा कर्म किया है जो इस ईद पर बख्शा गया है तो उन साहब का जवाब था नहीं मिया ऐसी बात नहीं है इसका नंबर कल ले लेंगें मैं उन साहब की बात सुनकर हैरान रह गया मैंने उनसे कहा मगर मिया ईद तो आज है फिर आप कल क्यूँ इसका नंबर लगाओगे अब छोडों अगली ईद पर देख लेना तो उसका जवाब था पहले ही इतना माल पड़ा है पहले उसको तो निबटा लें और फिर इसे पाला तो गया है आज के लिए अगली ईद का क्या मतलब आज नहीं तो कल इसका काम कर देना है इतना सुनकर मैं मन ही मन सोचने लगा चलो इस गरीब की चंद घंटो के लिए मौत तो टली और वो गरीब (बकरा) अपने मालिक के साथ मस्ती में हिलता-डुलता साथ हो लिया मैं अपनी दूकान बढ़ाकर साइकल ले चलता बना मगर पैदल मारते वक्त बस यही सोच रहा था यार हौस्लेवाला जब तेरा राजा (कुत्ता) गुजरा था तो तुझे एक हफ्ते तक रोटी भी अच्छी नहीं लगी थी और ये मुसलमान है उसे दिलो-जान से बच्चे की तरह पालते है और बकरीद के दिन अपने ही हाथों से उस गरीब की गर्दन कलम कर देते है इस दिन इनकी भावनाओं को क्या हो जाता है क्या इस दिन इनका बकरे के प्रति प्यार नफरत तब्दील हो जाता है या फिर परम्परा के नाम पर ये लोग निरीह जीव के प्राण हरने में माहिर होते है तभी पीछे होर्न की आवाज से मेरा ध्यान भंग हाया तो देखा ग्रीन लाईट हो चुकी थी मैं चारों तरफ देखता हुआ आगे बढ़ गया

                  थोड़ी दूर चलने के बाद मैं फिर विचारों के समंदर में गोते लगाने लगा तो ख्याल आया बकरे की बलि चढाने से क्या वाकई खुदा खुश होता है क्या बलि चढाने से वाकई जन्नत मिल जाती है क्या बलि चढाने से वाकई ७२ हूरें मिल जाती है फिर अगले ही पल ख्याल आया हिंदू धरम में मुर्गे की और भैसें की बाली चढाई जताई है क्या माताएं ऐसा करने खुश हो जाती है क्या दारु चढाने से काली खुश हो जाती है अब इसमें एक माता हो तो उसका नाम भी लिखूं मगर यहाँ तो पता नहीं कितनी माताएं है इनके नाम पर ना जाने किस-२ की बलि चढ़ा दी जाती है यहाँ तक की इंसानों को भी बलि चढ़ा दिया जाता है क्या ऐसा करने से वाकई स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है तो फिर मैं नहीं मानता की वो माता हो सकती है ऐसा हो ही नहीं सकता की कोई माँ बेजुबान जीवों की बलि लेकर खुश होती हो ऐसा कोई खुदा हो ही नहीं सकता जो बकरों की बलि लेकर खुश होता होगा ऐसा हो ही नहीं सकता ऐसा करने से जन्नत मिलती हो अगर ऐसा है तो क्यों ना फिर अपने बच्चों को ही बलि चढ़ा दिया जाए जो सीधे जन्नत का रास्ता प्रसस्त हो जाए वो भी बेरोकटोक के, तो फिर क्यों ना अपने माँ-बापो की ही बलि चढा दी जाए जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए तभी अचानक कार की ब्रेकों की आवाज से मेरे विचार भंग हुए और मैं मुस्कराता हुआ अपनी मंजिल की ओर बढ़ता चला गया   
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