पवित्र क़ुरआन में क़ुरबानी का हुक्म
फ़सल्लि लिरब्बिका वन्हर.
अर्थात पस तू अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ और क़ुरबानी कर।
अलक़ुरआन, 108, 2
तफ़्सीर - यानि नमाज़ भी सिर्फ़ एक अल्लाह के लिए और क़ुरबानी भी सिर्फ़ एक अल्लाह के नाम पर। मुश्रिकीन की तरह उनमें दूसरों को शरीक न कर।
‘नह्र‘ के अस्ल अर्थ हैं ऊंट के हलक़ूम में नेज़ा या छुरी मारकर उसे ज़िब्ह करना। दूसरे जानवरों को ज़मीन पर लिटा कर उनके गलों पर छुरी फेरी जाती है उसे ज़िब्ह करना कहते हैं लेकिन यहां ‘नह्र‘ से मुराद मुत्लक़ क़ुरबानी है। इसके अलावा इसमें बतौर सदक़ा व ख़ैरात जानवर क़ुरबान करना, हज के मौक़े पर मिना में और ईदुल अज़्हा के मौक़े पर क़ुरबानी करना सब शामिल हैं।
अनुवाद: मौलाना मुहम्मद जूनागढ़ी साहब
तफ़्सीर: मौलाना सलाहुद्दीन यूसुफ़ साहब
यह अनुवाद और यह तफ़्सीर सऊदी हुकूमत की तरफ़ से प्रकाशित की गई है।
# उर्दू से हिंदी अनुवाद: डा. अनवर जमाल
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